राजस्थानी तीज-त्यूँवार, नेगचार, गीत-नात, पहराण, गहणा-गांठी अर बरत-बडूल्यां री सोवणी सी झांकी है तीज-त्यूँवार...
विष्णु भगवान ब्याह रचाबा जाण लाग्या अर सगला देवी देवता नै जान मैं जाण कई खातिर बुलावो भेज्यो। जद बरात जाण लागी तो साराई जणा बोल्या कि गणेशजी नै तो कोनी लेर जावां क्यूंकि बै सवा मण मूंग को कलेवो करै अर जीमण फेर बुलावो। दुंद दुंदाळो सूंड सुंडाळो...... उखला सा पग...... छाजळा सा कान अर मस्तक मोटो। इनै सागै लेकै के करस्यां। इनै तो घर कि रूखाळी कै खातर छोड़ चालो। इत्ती बात करके सारा जणा बरात मैं चल्या गा। बठीनै नारदजी आ कै गणेशजी नै लगावणा सिखावणा कर दिया कि थारो तो मान ई कोनी राख्यो। बरात बुरी लागती इयां सोच कै थानै अठे ई छोडगा........ ओ तो भोत अपमान कर दियो थारो। बस फेर के हो, गणेशजी आपका मूसा नै कहयो कि जाओ अर जाकै सारी धरती नै थोथी कर दयो। सारो को सारो रास्तो मूसा खोद दिया जीसेँ बरात कै सागै ही भगवान विष्णु का रथ का पहिया भी माटी मैं धंसगा। सै जणा पच लिया पण पहिया कोनी निकाळ सक्या। जद फेर खाती नै बुलायो। बो आकै पहिया कै हाथ लगाकै बोल्यो.... जय गणेशजी की। अर रथ का पहिया निकळ गा। सै कोई पूछ्णै लाग गा की गणेश जी नै क्यूँ समरयो। तो खाती बोल्यो की गणेशजी नै सुमरीयाँ बिना कोई काम सिद्ध कोनी हो सके। जद सै कोई सोचण लाग्या की आपां तो बानै घरां ई छोड्याआ। पाछै सै कोई जाकै बांकी मान मनवार करी अर बरात मैं लेकै आया। फेर पैल्याँ गणेशजी नै रिद्धी सिद्धी परणाई पाछै विष्णु भगवान को ब्याव लिछ्मीजी सें करयो।



हे गणेशजी महाराज जियां थे विष्णु भगवान को कारज सारयो बियां ई सैको करज्यो। कहताँ सुणताँ हुंकारा भरतां को। पीर सासरे सुख शांति राखज्यो।

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